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रास्ते भर रास्ता ढूंढते हैं

देश में इस वर्ष मानसून लगभग अपने सामान्य गति से चल रहा है. कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश ने जनजीवन को काफी प्रभावित किया है. हालांकि मानसून का आना देश में सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. लेकिन अति वर्षा से कई इलाकों में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण स्थानीय नागरिकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों के लिए आर्थिक रूप से मानसून अहम तो है लेकिन इससे उनकी दैनिक दिनचर्या सबसे अधिक प्रभावित होती है. अत्यधिक वर्षा से ग्रामीण क्षेत्र अन्य इलाकों से कट कर रह जाते हैं. इसकी मुख्य वजह सड़क का नहीं होना है. कच्चे और फिसलन भरे रास्तों पर चलना दूभर हो जाता है.

वैसे तो पहाड़ी क्षेत्र का नाम सुनते ही न जाने कितनी कल्पनाएं हमारे दिमाग में बन जाती हैं. पहाड़ी क्षेत्र है तो ठंडी हवाएं चलती होंगी, शुद्ध वातावरण होगा, गर्मी का नामों-निशान नहीं होगा. प्रतिदिन बारिश से मौसम सुहावना रहता होगा आदि. पहाड़ी क्षेत्रों का ग्रामीण जीवन किसी स्वर्ग से कम नहीं होगा. परंतु कल्पनाओं से हकीकत बिल्कुल विपरीत है. जब यहां लगातार बारिश आती है तो लोगों की जान को मुसीबत हो जाती है. कई बार बादल फटने अथवा ज़मीन धंसने की घटनाओं से जान माल का काफी नुकसान होता है. इस समय भी इस पहाड़ी राज्य में अत्यधिक बारिश तबाही मचा रहा है. दूर दराज़ के कई गांव ऐसे हैं जो अन्य इलाकों से कट गए हैं क्योंकि पक्की सड़क नहीं होने के कारण वहां पहुंचना मुश्किल हो गया है. बिजली और संचार की व्यवस्था भी लगभग ठप हो गई है. ऐसे में कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि वहां का सामाजिक जीवन किस प्रकार कष्टकर होता होगा? बच्चों की पढ़ाई कितनी प्रभावित होती होगी?

उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित कपकोट ब्लॉक का बघर गांव, जो पहाड़ की चोटी पर बसा है. यह पहाड़ पर बसा आखिरी इंसानी गांव है. यहां पर आकर सीमा समाप्त हो जाती है. इसके आगे कोई गांव नहीं है. इस गांव में सड़क न होने की वजह से लोग बहुत मुसीबत का सामना करते हैं. एक तो यह आखिरी गांव है जहां सड़क की कोई सुविधा नहीं है. इससे ग्रामीणों विशेषकर स्कूल जाने वाले छात्र-छात्राओं को सबसे अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. सड़क की सुविधा न होने के कारण किशोरियों को जंगल के रास्ते से स्कूल जाना पड़ता है जिसकी वजह से उन्हें स्कूल आने जाने में काफी देर हो जाती है. इसके अलावा उन्हें हर समय रास्ते में किसी अनहोनी का भी डर सताता रहता है. इस संबंध में गांव की किशोरियों नेहा और बबली का कहना है कि हमारा स्कूल गांव से 4 किमी दूर है और जहां सड़क की सुविधा भी नहीं है, जिस कारण हमें जंगल के रास्ते से स्कूल जाना पड़ता है.

इन्हीं परेशानियों के कारण न तो हम समय से स्कूल पहुंच पाते हैं और न ही घर. जिससे हमारी पढ़ाई पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. जब स्कूल जाते समय हमें जंगलों से गुजरना पड़ता है तो जानवरों का भी भय बना रहता है. अगर ऐसे में कोई जंगली जानवर आ जाए तो हम कहीं भाग भी नहीं सकते हैं. रास्ते सही नहीं होने के कारण न तो हम भाग सकेंगे और न ही मदद के लिए किसी को बुला सकेंगे. वह बताती हैं कि जब बारिश होती है तो जंगल के कच्चे रास्ते कीचड़ से भर जाते हैं. ऐसे में हमें डर भी लगता है कहीं हम फिसल कर खाई में गिर न जाएं. उन्होंने कहा कि यदि स्कूल आने जाने के लिए सड़क मिल जाए तो हमें एक सुरक्षित रास्ता मिल जाएगा, जिससे हम स्कूल और घर समय पर पहुंच सकते हैं, जिससे हमारी शिक्षा भी प्रभावित नहीं होगी.

सड़क न होने से परेशान गांव वासी लाल सिंह और पवन सिंह का कहना है कि हम मजदूरी करने वाले लोग हैं, हमें रोज काम करने के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है. गांव में जहां बहुत थोड़ी सड़क ठीक है वह भी बारिश के दिनों में खराब हो जाती है. उन पर पानी भर जाता है जिससे आने-जाने में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. रास्ता सही न होने के कारण हमें राशन और खाने-पीने की सामग्री आदि लाने में भी मुश्किल आती है. बरसात के दिनों में हम दो या तीन दिन तक घर से बाहर भी नहीं निकल पाते हैं. इन दिनों यहां बादल फटने का डर भी हर समय सताता रहता है.

वहीं बुजुर्ग महिला जसुली देवी का कहना है कि हम भी अपने बच्चों का उज्ज्वल भविष्य चाहते हैं. लेकिन गांव में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं. सबसे अधिक कठिनाई सड़क की है जो नाममात्र की है. सड़क की हालत इतनी खस्ता है कि उस पर आम दिनों में चलना मुश्किल है. ऐसे में बारिश के दिनों में इसकी क्या हालत होती होगी, इसका अंदाज़ा शहरों में रहने वाले लोग नहीं लगा सकते हैं. टूटी फूटी सड़कों के कारण स्कूल जाने वाले बच्चों और गांव के बुजुर्ग को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. सड़क नहीं होने के कारण गांव तक एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती है, जिससे मरीज़ों को चारपाई पर लिटा कर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है, जो वर्षा के दिनों में सबसे खतरनाक परिस्थिति होती है.

इस संबंध में राजकीय इंटर कॉलेज, बघर के शिक्षक प्रताप सिंह का कहना है कि यह कॉलेज बघर गांव से चार किमी दूर है. यहां बहुत दूर दूर से बच्चे आते हैं. उन्हें आने जाने में कई मुश्किलें आती हैं जिस कारण वह समय से स्कूल नहीं पहुंच पाते है और उनकी पढ़ाई छूट जाती है. बरसात के दिनों में अधिक बारिश होती है तो बच्चे स्कूल आना बंद कर देते हैं. अगर सड़क बन जाती है तो यह बच्चे स्कूल समय पर पहुंच पाएंगे और अपनी शिक्षा पूरी कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन भले ही गांव गांव तक सड़के बनाने का लाख दावा करे, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद भयावह है. 

कम से कम बघर गांव में तो सरकारी दावे के विपरीत परिस्थिति है जहां सड़कों की हालत बेहद खराब है. यह वह गांव है जहां लोग सड़कों पर चलने के लिए सड़क ढूंढते हैं, लेकिन उनकी खोज कभी पूरी नहीं होती है. हालांकि गांव वालों का विश्वास है कि देश के गांव गांव तक सड़कों का जाल बिछाने वाली सरकार एक दिन उनके गांव तक भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा ज़रूर पहुंचाएगी.

यह आलेख उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित कपकोट ब्लॉक के अंतिम गांव बघर की युवा लेखिका हंसी बघरी ने चरखा फीचर के लिए लिखा है

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