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एनीमिया से ग्रसित झारखंड का ग्रामीण क्षेत्र

एनीमिया रक्त से संबंधित एक ऐसी बीमारी है जो शरीर में आयरन की कमी से होता है. मानव शरीर में जब हीमोग्लोबिन का बनना कम हो जाता है तब शरीर की स्फूर्ति भी धीरे धीरे घटती चली जाती है, परिणामस्वरूप इंसान सुस्त व कमजोर होता चला जाता है. शरीर की क्रियाशीलता घटने से मनुष्य के जीवन की पूरी व्यवस्था ही कमोबेश प्रभावित हो जाती है और वह जीवन और मौत के बीच युद्धरत देखा जाता है. गर्भवती महिलाओं, छोटे-छोटे बच्चों व लम्बे दिनों से बीमार चल रहे इंसानों में अक्सर यह बीमारी देखने को मिलती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, गर्भवती महिलाओं में एनीमिया होने का अत्यधिक खतरा रहता है. दुनिया भर में 40 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिया से ग्रसित हैं. वैसे तो गर्भवती महिलाओं में 20 से 30 फीसदी अधिक ब्लड सप्लाई होता है ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे को ज्यादा मात्रा में ऑक्सीजन मिल सके किन्तु ऐसा हमेशा संभव नहीं है.

चिकित्सकों के मुताबिक एनीमिया तीन तरह का होता है – माइल्ड, मॉडरेट व सीवियर. अगर बॉडी में हीमोग्लोबिन 10 से 11 जी / डीएल के आसपास हो तो इसे माइल्ड एनीमिया कहते हैं. यदि हीमोग्लोबिन 8 से 9 जी / डीएल हो तो यह मॉडरेट एनीमिया कहा जाता है, और यदि हीमोग्लोबिन 8 जी / डीएल से कम हो तो इसे सीवियर एनीमिया कहते हैं. सीवियर एनीमिया एक गंभीर स्थिति है, जिसमें मरीज की हालत इतनी बुरी हो जाती है कि उसे खून चढ़ाने की नौबत आ जाती है. उपरोक्त तीनों में से सबसे आम आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया है. आंकड़ों के मुताबिक करीब 90 फीसदी लोगों में यही एनीमिया होता है. आयरन की कमी वाला एनीमिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें रक्त में पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं की कमी होती है. यह लाल रक्त कोशिकाएं शरीर के ऊतकों में ऑक्सीजन ले जाती हैं. जब आदमी का शरीर पर्याप्त नई रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करना बंद कर देता है तो उसकी अवस्था उसे थका हुआ संक्रमण और अनियंत्रित रक्तस्राव के लिए प्रवण छोड़ जाता है. हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं को ऑक्सीजन ले जाने में सक्षम बनाता है.

वैसे झारखंड में एनीमिया की स्थिति ज्यादातर वैसे क्षेत्रों में देखने को मिलती है जहां गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास, महिलाओं के प्रति दोहरी मानसिकता, अनावश्यक प्रजनन, आहार की समस्या और उचित संसाधनों का अभाव पाया जाता है. दलित, आदिवासी, अनपढ़ और आर्थिक स्तर पर पिछड़े इलाकों में एनीमिया जैसी बीमारी से प्रतिवर्ष सैकड़ों महिलाएँ, पुरुष व बच्चे असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं. आदिवासी बहुल इलाकों में जहां एक ओर खेती और वनोपज पर अधिकांश आबादी की निर्भरता होती है, वहीं दूसरी ओर पौष्टिक भोजन की अपेक्षा दारू, हड़िया जैसे नशीले पेय पदार्थों का सेवन, घर से लेकर बाजार तक की तमाम व्यवस्था में औरतों का अत्यधिक शारीरक श्रम व शिक्षा तथा आय उर्पाजन के लिए पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर परिवार की निर्भरता भी औरतों और किशोरियों में इस बीमारी के फैलने का एक बड़ा कारण है.

इस संबंध में पटमदा, पूर्वी सिंहभूम में पदस्थापित डॉ. क्रिस्टोफर बेसरा के अनुसार एनीमिया कई वजहों से हो सकता है. जिसमें लगातार खून बहने की वजह से, शरीर में खून की कमी, फोलिक एसिड, आयरन, प्रोटीन, विटामिन सी और बी 12 की कमी प्रमुख है. डॉ. बेसरा के अनुसार यदि किसी के पारिवारिक इतिहास में ल्यूकेमिया या थैलीसीमिया की बीमारी रही हो तो फिर उस स्थिति में एनीमिया होने के चांस 50 फीसदी तक बढ़ जाते हैं. किसी दुर्घटना में अत्यधिक रक्तस्राव, अल्सर, मासिक धर्म या कैंसर एनीमिया के प्रमुख लक्षण हैं. आसान थकान और ऊर्जा की हानि, असामान्य रूप से तेजी से दिल की धड़कन, व्यायाम के समय सांस की तकलीफ व सिरदर्द, सर चकराना, पीली त्वचा, पैर की मरोड़, अनिद्रा, सरदर्द इसके अन्य प्रमुख लक्षण हैं. 

एनीमिया की रोकथाम के संबंध में डॉ. क्रिस्टोफर बेसरा का कहना है कि उचित आहार का पालन करके आयरन की कमी, विटामिन बी 12 की कमी और विटामिन बी 9 की कमी से होने वाले एनीमिया को रोका जा सकता है. इस बीमारी में पर्याप्त खाद्य पदार्थों के साथ एक संतुलित पौष्टिक आहार शामिल है. पौष्टिक और संतुलित भोजन के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होता है कि शुद्ध और पर्याप्त पानी का सेवन किया गया है या नहीं? ये सभी हीमोग्लोबिन के स्तर को काफी हद तक बनाए रखने में मदद करते हैं. डॉ. बेसरा का मानना है कि रक्त परीक्षण न केवल एनीमिया के निदान की पुष्टि करता है, बल्कि अंतर्निहित स्थिति को इंगित करने में भी मदद करता है. पूर्ण रक्त गणना (सीबीसी), लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या, आकार, मात्रा और हीमोग्लोबिन सामग्री को निर्धारित करती है. रक्त लोहे का स्तर और सीरम फेरिटिन स्तर, शरीर के कुल लोहे के भंडार का सबसे अच्छा संकेतक माना जाता है.

झारखण्ड के कई जिलो मे महिलाओं में एनीमिया की समस्या काफी बढ़ गई है. आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट- 2021-22 में एनएफएचएस-4 तथा एनएफएचएस-5 के आंकड़ों की तुलना करते हुए बताया गया है कि राज्य के 24 जिलों में से 10 जिलों में सभी आयु की महिलाओं (15-49 वर्ष) में एनीमिया में वृद्धि हुई है. 14 जिलों में युवा महिलाओं (15-19 वर्ष) में एनीमिया में वृद्धि हुई है. हालांकि रिपोर्ट के अनुसार राज्य में संस्थागत प्रसव में काफी सुधार हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी सिंहभूम में वर्ष 2015-16 में संस्थागत प्रसव सबसे कम 37 प्रतिशत थी जो वर्ष 2019-21 में बढ़कर लगभग दोगुनी 68 प्रतिशत हो गई है. झारखंड में केवल 1998-99 की अवधि के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) थोड़ा अधिक था. इसके बाद वर्तमान दौर 2019-21 तक ग्रामीण क्षेत्रों में टीएफआर अधिक है. मेडिकल स्टाफ की झारखंड में कमी आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में स्वास्थ्य में चिकित्सकों, स्टाफ नर्स तथा एएनएम की कमी का भी उल्लेख किया गया है. राज्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों के कुल 1,023 तथा चिकित्सा पदाधिकारियों के 803 पद रिक्त हैं. राज्य में एएनएम के कुल 2,578 तथा स्टाफ नर्स के 515 पद रिक्त हैं. जो यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी का प्रमुख कारण है. 

राज्य गठन के 21 वर्ष बाद भी झारखंड कुपोषण से पीड़ित है. 15 नवम्बर 2000 को अविभाजित बिहार से अलग होने के बाद इस राज्य के आंतरिक संसाधनों सहित शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उन्नत बनाए रखने की बातें तो लगातार की जाती रही, किंतु धरातल पर यह प्रदेश किसी और स्थिति से गुजर रहा है. ताजा राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण के अनुसार, झारखंड के 42.9 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. यह संख्या देश में सर्वाधिक है. एनीमिया से झारखंड के 69 प्रतिशत बच्चे और 65 प्रतिशत महिलाएं प्रभावित हैं. एनीमिया जैसी समस्या के समाधान की दिशा में किये जा रहे कार्य माताओं, बच्चों व किशोरियों के स्वास्थ्य में सुधार कर कुपोषण और एनीमिया के खिलाफ सूबे की सरकार ने तीन वर्षीय महाअभियान चला रखी है. अभियान के लिए बनाई गई टीम के माध्यम से घर-घर जाकर पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण से सम्बंधित जानकारी के साथ-साथ एनीमिया से पीड़ित 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग की किशोरियों, महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य की जानकारी हासिल करने की व्यवस्था की गई है. 

एनीमिया और कुपोषण के लक्षण दिखने पर नजदीकी आंगनवाड़ी केंद्र में रोगी की सघन जांच और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करने की व्यवस्था बनाई गई है. गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को आवश्यक उपचार के लिए निकटतम स्वास्थ्य केंद्र भेजना सरकार की प्राथमिकता सूची में सबसे आगे है. राज्य सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास सराहनीय है, लेकिन यह अभी भी लक्ष्य से काफी दूर है. ऐसे में एक ऐसी योजना पर अमल करने की आवश्यकता है जिससे राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों को एनीमिया मुक्त बनाया जा सके, ताकि आने वाली पीढ़ी स्वस्थ्य हो सके. 

यह आलेख दुमका, झारखंड से वरिष्ठ लेखक अमरेंद्र सुमन ने चरखा फीचर के लिए लिखा है

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